पीएचडी के लिए अब आनंद और नारायण बन रहे पसंद

भोपाल। अंग्रेजी साहित्य की किवदंती कहलाने वाले विलियम शेक्सपीयर, थॉमस हार्डी व जेन ऑस्टिन जैसे साहित्यकार अब शोध के लिहाज से बीते समय की बात होने लगे हैं।

नए व मूल सृजन की चाहत में अब शोधार्थी इनके बजाए भारतीय मूल के अंग्रेजी साहित्यकारों को तरजीह दे रहे हैं, विशेषकर नए साहित्यकारों को। बरकतउल्ला विवि से अंग्रेज़ी साहित्यकारों पर हुए शोध पर नज़र डालें तो शेक्सपीयर के बजाए मुल्कराज आनंद व आरके नारायण जैसे भारतीय मूल के अंग्रेजी साहित्यकार शोधार्थियों के लिए नई पसंद बनकर उभरे हैं।

बरकतउल्ला विवि ने पिछले दस साल की पीएचडी उपाधियों पर आधारित जो किताब 'डॉक्टोरल स्टडीज 2000-09" प्रकाशित की है उसके मुताबिक शेक्सपीयर पर शोध करने वालों की संख्या पिछले दस साल में मात्र 3 हैं, जबकि मुल्कराज आनंद पर 7 तथा आरके नारायण पर 6 लोगों ने शोध किया। भारतीय मूल की ही अंग्रेजी साहित्यकार अनिता देसाई इस मामले में जेन आस्टिन व थॉमम हार्डी के समकक्ष है।

यही नहीं शोध के लिए शोधार्थी अब वीएस नायपॉल, झुम्पा लाहिड़ी व अरुंधति राय, शशि देशपाण्डे जैसे भारतीय मूल के अंग्रेजी लेखकों को पसंद करने लगे हैं। पुस्तक में संकलित शोध संख्या व विषयों को देखें तो पिछले दो से तीन साल में अनिता देसाई के बाद वीएस नायपॉल, झुम्पा लाहिड़ी व अरुंधति राय जैसे लेखक शोधार्थियों के लिए पसंदीदा साहित्यकार बनकर उभरे हैं।

इसकी वजह अंग्रेजी साहित्य की प्रोफेसर डॉ.शुभ्रा त्रिपाठी बताती हैं कि भारतीय मूल के अंग्रेजी साहित्यकार भारत की संस्कृति को दुनिया भर में प्रस्तुत कर रहे हैं। शेक्सपीयर, आस्टिन व हार्डी एक तरह से काफी पुराने हो गए हैं और अब इनमें कुछ नया काम नहीं हो रहा है जबकि भारतीय साहित्यकार नया सृजन कर रहे हैं।

यही वजह है कि यहाँ के शोधार्थियों पीएचडी के लिए अब भारतीय मूल के अंग्रेजी साहित्यकारों को तरजीह दे रहे हैं। 'डॉक्टोरल स्टडीज 2000-09" के अनुसार मुल्कराज आनंद पर 7, आरके नारायण पर 6, विलियम शेक्सपीयर पर 3, थॉमस हार्डी पर 3, जेन आस्टिन पर 3, चार्ल्स डिकंस पर 3, अनिता देसाई  पर 3, झुम्पा लाहिड़ी पर 1, वीएस नायपॉल पर 1, अरुंधति राय पर 1 शोधार्थी ने पीएचडी की है। 
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