प्रो. एसके सिंह

मध्यप्रदेश के भोज मुक्त विश्वविद्यालय ने पिछले कुछ सालों में तमाम कठिनाईयों के बीच दूरस्थ शिक्षा को फैलाने के लिए कई काम किए हैं। विश्वविद्यालय को इस काम कहीं असफलता मिली तो कहीं सफलता भी मिली है। अप्रैल 2013 को अपना कार्यकाल पूरा कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.एसके सिंह का कहना है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में विश्वविद्यालय के हित में कई काम किए हैं। पेश है एजुकेशन हेराल्ड (ईएच)  की उनके साथ हुई बातचीत के कुछ अंश-

ईएच: भोज मुक्त विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के बाद अब आपका कार्यकाल समाप्त होने को आ गया है। कैसा रहा आपका कार्यकाल ?

प्रो.एसके सिंह: चार साल पहले कुलपति बनने के बाद जब इस विश्वविद्यालय को ज्वाइन किया था तब इसकी हालत काफी बिगड़ी हुई थी। कई गड़बड़ियां थी यहां। पिछले चार साल के कार्यकाल में इन्हीं गड़बड़ियों को दूर करने की कोशिश की हैं। कहीं सफलता मिली है तो कई असफलता भी हाथ लगी है। हालांकि इस दौरान हमेशा ही विश्वविद्यालय को आर्थिक व अकादमिक रूप से मजबूत करने की कोशिश की है। विश्वविद्यालय की सालाना अनुमानित आय 55.37 लाख रुपए है जबकि हमने 41.98 लाख रुपए का व्यय किया है। सीधे-सीधे हमनें एक से दो करोड़ रुपए बचाए हैं।

ईएच: कार्यकाल में आपकी सबसे बड़ी उपलब्धी क्या रही ?

प्रो.एसके सिंह: हाल ही में भोज मुक्त विश्वविद्यालय को जो सबसे बड़ी उपलब्धी मिली है वो है डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) चैनल। देश के जिन विश्वविद्यालयों को यह चैनल मिला है उसमें मध्यप्रदेश का भोज मुक्त विश्वविद्यालय भोपाल  भी शामिल है। इस योजना के तहत भोज विश्वविद्यालय सभी विषय विशेषज्ञों के व्याख्यानों की वीडियो रिकार्डिंग कर सभी 50 एजुकेशनल चैनलों पर टेलीकास्ट करेगा। इस काम में आंध्रप्रदेश का डॉ.बीआर अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय हैदराबाद तकनीकी मदद करेगा। भोज मुक्त विश्वविद्यालय का काम केवल इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना है।

ईएच: भोज मुक्त विश्वविद्या
लय के छात्रों को अकसर शिकायत रहती है कि उन्हें समय पर स्टडी मटेरियल नहीं मिल पाता है। छात्रों की इस समस्या को दूर करने के लिए विश्वविद्यालय अपनी तरफ से क्या पहल कर रहा है ?

प्रो.एसके सिंह: भोज मुक्त विश्वविद्यालय जल्द ही उन सभी विषयों के स्टडी मटेरियल अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध करा रहा है जो विश्वविद्यालय में संचालित हो रहे हैं। दरअसल देश के सभी मुक्त विश्वविद्यालयों का सिलेबस एक जैसा करने की योजना है। इस पर तेजी से काम किया जा रहा है। इसके लिए बकायद इंटर यूनिवर्सिटी कंसोर्टियम बनी हुई है जो इस दिशा में काम कर रही है। भोज विश्वविद्यालय सभी संचालित विषयों के स्टडी मटेरियल को वेबसाइट पर अपलोड कराकर छात्रों को
डाउनलोड करने को कहेगा। अभी ट्रकों में भरकर स्टडी मटेरियल सेंटर्स पर भेजे जाते हैं। इसमें कई बार देरी भी हो जाती है जिससे छात्रों को ही नुकसान उठाना पड़ता है।

ईएच: दूरस्थ शिक्षा को लेकर लोगों में कैसा रुझान है। क्या आपको लगता है कि इसमें अभी कुछ सुधार की या इसे अभी और लोकप्रिय बनाने की जरूरत है ?

प्रो.एसके सिंह: अभी भारत में दूरस्थ शिक्षा को लेकर कई भ्रांतियां हैं। लोगों में दूरस्थ शिक्षा को लेकर अभी भी जागरुकता नहीं आयी है। जबकि विदेशों में खासकर ब्रिटेन में दूरस्थ शिक्षा काफी लोकप्रिय है। ब्रिटेन में तो लोग दूरस्थ शिक्षा से ही पढ़ाई करने को प्राथमिकता देते हैं। भारत में भी दूरस्थ शिक्षा को लोगों में लोकप्रिय बनाने की दिशा में काम करने की जरूरत है।

ईएच: भोज मुक्त विश्वविद्यालय छात्रों को आकर्षित करने के लिए क्या कोई योजना तैयार कर रहा है?

प्रो.एसके सिंह: भोज मुक्त विश्वविद्यालय सत्र 2013-14  से दो नए कोर्स शुरू करने जा रहा है। इसमें एक एमए मनोविज्ञान तथा दूसरा मूल्य शिक्षा एवं अध्यात्म पर पोस्ट ग्रजुएट डिप्लोमा शामिल है। हालांकि विश्वविद्यालय ने पूर्व में करीब आधा दर्जन नए विभाग व कोर्स शुरू करने का भी प्रस्ताव तैयार किया था जिसके लिए शासन से शैक्षणिक व गैरशैक्षणिक पदों की मंजूरी भी मिल गई थी। लेकिन भर्ती प्रक्रिया का मामला अदालत में जाने के कारण फिलहाल नए विभाग खोलने का मामला लंबित हो गया है। विश्वविद्यालय ने हाईकोर्ट को अपना जवाब दे दिया है।

ईएच: आप पर अपने कार्यकाल के दौरान अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। कितनी सच्चाई है इसमें ?
प्रो.एसके सिंह: हां यह सही है कि कार्यकाल के दौरान अनियमितता के आरोप लगे हैं। लेकिन वे सब निराधार हैं। आरोप लगाने वाले तो बिना सबूत के आरोप लगाते देते हैं। अगर इनमें थोड़ी सी भी सच्चाई होती तो राजभवन कार्रवाई करता लेकिन आज  तक मुझ पर लगा आरोप सही साबित नहीं हुआ है। दरअसल विश्वविद्यालय में ही कुछ लोग हैं जो मुझसे खुश नहीं है। वे ही लोग इस तरह की हरकत करते हैं। इसकी वजह विश्वविद्यालय में जो आर्थिक गड़बड़ियां होती थी उस पर हमनें लगाम लगायी है। इसी से वे नाराज हैं। 
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