दक्षिण एशिया में अविश्वास सबसे बड़ी समस्या

दक्षिण एशिया में इस समय अविश्वास की स्थिति सबसे बड़ी समस्या है। यह पूरा क्षेत्र हथियारों की दौड़ तथा आतंकवाद से जूझ रहा है। इस क्षेत्र में शांति बहाल कर इसे विकास की दौड़ में शामिल करने के लिए हथियारों की दौड़ को रोकना, कट्टरपंथ व आतंकवाद को समाप्त करना, गुटनिरपेक्ष आंदोलन फिर से प्रभावी बनाना तथा दुनिया को एक ध्रुवीय के स्थान पर बहुध्रुवीय ताकक के रूप में विकसित करना जरूरी हो गया है।
 
यही समय की भी मांग है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मालद्वीप, श्रीलंका अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था का कामजोर होना भारत के हित में नहीं है। आज भारत अनुभव संपन्न व बड़ा देश है। इसलिए भारत की विदेश नीति ऐसी होनी चाहिए कि वह इन सब देशों को एक जुट रख सके। अब समय आ गया है कि हम भी यूरोप की तरह एक मुद्रा पर विचार करना शुरू कर दें।
 
जब यूरोपियन देश एक नया संघ व मौद्रिक नीति बना सकते हैं तो दक्षिण एशिया में इस प्रकार की व्यवस्था लागू करने में क्या परेशानी है ? सार्क देश अपनी समस्याओं व मतभेदों को दरकिनार कर यूरो की तरह ही कोई नई मौद्रिक नीति बनाते हैं तो यह सभी के लिए हितकारी होगी।
 
हालांकि भारत के लिए अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र बनाना आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है। हम वैश्विकरण पर विश्वास करते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अमेरिका के शरणागत हो जाएं या उसके पिछलग्गू बन जाएं। पूर्व में दुनिया दो ध्रुवीय थी। जिनमें अमेरिका व सोवियत संघ का वर्चस्व था। लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद की स्थिति में भारत की विदेश नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है।
 
वर्तमान परिदृश्य में भारत की उपेक्षा नहीं की जा सकती। पूर्व प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू व राजीव गांधी के समय हमारे सामने दोनों ध्रुवों के बीच संतुलित विदेश नीति पर चलना चुनौतिपूर्ण था। एक दूसरे नजरिए से देखा जाए तो मध्य एशिया में महत्वपूर्ण खनिज संपदा है और अमेरिका की नजर उस पर है। दुनिया को कब्जे में रखना अमेरिका का उद्देश्य है। आज यूरोप पूरी तरह से सुरक्षित क्यों है यह सोचने की बात है।
 
वर्ष 2020 तक भारत और चीन दो बड़ी अर्थव्यवस्था होगी। चीन तेजी से बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था बन रहा है। भारत उसके मुकाबले अभी पीछे है। वहीं अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ खड़ा करना चाहता है। दुनिया इस बात को मानती है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। हमने आधुनिकीकरण तो कर लिया लेकिन विचारों में आधुनिकता नहीं ला पाए हैं।

(लेखक के यह विचार एनआईटीटीटीआर भोपाल में 'सार्क देशों के संदर्भ में भारत की विदेश नीति" विषय पर पर दिए व्याख्यान से लिए गये हैं)
 
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