सेना की जमीन पर हुए अतिक्रमण का पता लगाएगा मैनिट

भोपाल। मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (मैनिट) भोपाल मध्यप्रदेश में सेना की जमीन पर हुए अतिक्रमण का पता लगाएगा। यह काम सेटेलाइट की मदद से किया जाएगा। इसकी शुरूआत जबलपुर स्थित केंटोनमेंट (सैन्य छावनी) से की जा रही है।

इस काम के लिए मैनिट का रक्षा मंत्रालय के साथ बाकायदा करार हो चुका है। दो महीने पहले ही मैनिट के एक्सपर्ट का एक दल जबलपुर की सैन्य छावनी को दौरा कर लौटा है।

जबलपुर के केंटोनमेंट बोर्ड ने इस काम की जिम्मेदारी मैनिट के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के तहत खोले गए रिमोट सेंसिंग एंड जीआईएस (जियोलॉजिकल इंफॉरमेशन सिस्टम) सेंटर को सौंपी है। यह पूरा प्राजेक्ट दो साल का है।

इस काम की जिम्मेदारी संभाल रहे सेंटर के चेयरमेन डॉ. एसके कटियार ने बताया कि पूरे सेंट्रल इंडिया में इस काम की विशेषज्ञता केवल मैनिट के ही पास है, इसीलिए रक्षा मंत्रालय ने इस काम की जिम्मेदारी मैनिट को दी है। यह पूरा काम मार्डन मैपिंग टेक्नोलॉजी के द्वारा किया जाएगा।

इस काम के लिए जीपीएस (ग्लोबल पोजेसनिंग सिस्टम) की मदद ली जाएगी। इस प्रोजेक्ट के लिए मैनिट अमेरिकी सैटेलाइट से डिजिटल ग्लोब डाटा खरीदेगा। उसके बाद केंटोनमेंट की सीमाओं पर लगे पिल्लरों की सैटेलाइट से फोटो लेकर उनकी वास्तविक स्थिति पता की जाएगी।

फिर सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा ब्रिटिश काल में इस पूरे क्षेत्र के जो नक्शे बनाए गए थे उनकी मदद से पता किया जाएगा कि कहां-कहां के पिल्लर्स डिस्टर्बं हुए। उसके बाद सैटेलाइट इमेजरी से  केंटोनमेंट क्षेत्र की सीमाओं का पता लगाकर इनकी मैपिंग की जाएगी।

अभी तक यह काम आईआईटी रूड़की में ही हो रहा है। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) रूड़की के बाद मैनिट दूसरा शिक्षण संस्थान होगा जो सैन्य छावनियों के क्षेत्र में हुए अतिक्रमणों का पता लगाएगा।

डॉ. कटियार  के अनुसार आईआईटी रूड़की ने मेरठ, रूड़की व उत्तराखण्ड स्थित सैन्य छावनियों की ही सैटेलाइट मैपिंग की है। जबकि मैनिट के पास इस काम के लिए मध्य भारत की पांच सैन्य छावनियों की ओर से प्रस्ताव है।

जबलपुर के अलावा मैनिट को महु, पचमढ़ी, बबीना, सागर व मुरार स्थित केंटोनमेंट की मैपिंग करने का भी प्रस्ताव मिला हुआ है। संभवत: भोपाल की सैन्य छावनी की मैपिंग का काम भी मैनिट ही करेगा।

डॉ. कटियार ने बताया कि रक्षा मंत्रालय देश भर में स्थित 14 केंटोंमेंट की वास्तविक सीमाओं का पता लगा रहा है। इसी योजना के तहत यह काम किया जा रहा है।

जबलपुर सैन्य छावनी की स्थापना 1826 में हुई थी। उसके बाद धीरे-धीरे यह देश की सबसे प्रमुख सैन्य छावनी बन गई। वर्ष 2006 में केंटोन्मेंट एक्ट में हुए संशोधन के बाद इसका कुल एरिया 7040 एकड़ हो गया था। लेकिन समय के साथ इस सैन्य छावनी के क्षेत्र में बड़ी संख्या में अतिक्रमण हो गया। किस सैन्य छावनी के क्षेत्र में कितना अतिक्रमण है इसकी जानकारी अभी खुद रक्षा मंत्रालय को भी नहीं है।
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