विकृत पैदा होगी भोपाल गैस पीड़ितों की भावी पीढ़ी


यह खुलासा बरकतउल्ला विवि के जेनेटिक्स विभाग में हुए शोध में हुआ है। इस क्षेत्र में शोधकार्य करने के लिए विवि ने जीव विज्ञान संकाय के शोधार्थी ताहिर मोहिउद्दीन मल्ला को पीएचडी की उपाधि भी प्रदान की है। उनके शोध का विषय 'फालो अप सायटोजेनेटिक्स स्टडीज इन ह्युमन पॉप्युलेशन एक्सपोस्ड टू भोपाल गैस ट्रेजेडी 1984" था। यह अध्ययन जवाहर लाल केंसर हॉस्पीटल एंड रिसर्च सेंटर भोपाल के सहयोग से किया गया है। शोध के निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए करीब 100 गैस पीड़ितों के खून के सैपल्स का अध्ययन किया गया। इनमें 50 सामान्य गैस पीड़ित थे जबकि 50 ऐसे थे जो बुरी तरह गैस से प्रभावित हुए थे। जेनेटिक्स विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.एनसी शर्मा के अनुसार यह अध्ययन 25 से 50 वर्ष की आयुवर्ग के गैस पीड़ितों पर किया गया। अध्ययन के लिए यूनियन कार्बाइड के एक किमी के दायरे में रहने वाले गैस पीड़ितों के सैंपल्स एकत्र किए गए थे। अध्ययन के दौरान सामाने आए निष्कर्ष के अनुसार जो गैस पीड़ित एमआईसी (मिथाईल आइसोसायनेट) से बुरी तरह प्रभावित हुए थे उनका गुणसूत्र बुरी तरह विकृत हो चुका है। कोशिकाएं ठीक से विभाजित नहीं हो रही हैं और गुणसूत्रों की संख्या में बदलाव आ गया है। इस जेनेटिक्स समस्या से यह कहा जा सकता है कि इन गैस पीड़ितों की अधिकांश पीढ़ी इसी विकृति के साथ पैदा होगी। इसके अलावा गैस पीड़ित मानसिक विकृति का भी शिकार हो चुके हैं। अध्ययन के दौरान अधिकांश गैस पीड़ितों की मानसिक स्थिति सही नहीं मिली। यही नहीं अधिकांश गैस पीड़ित महिलाओं की प्रजनन क्षमता का भी बुरी तरह प्रभावित होना पाया गया है। गौरतलब है कि 2-3 दिसंबर 1984 की दरमियानी रात जेपी नगर स्थित यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से जहरीली एमआईसी गैस का रिसाव हुआ था। इससे प्रभावित होने वालों की संख्या पौने छह लाख बतायी जाती है। वर्ष 1985 से 1994 तक इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने गैस पीड़ितों पर कई रिसर्च किए हैं। लेकिन 1994 में ही सभी तरह के अध्ययन बिना किसी नतीजे पर पहुँचे बंद कर दिए गए थे। इसके चलते गैस पीड़ितांे की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चल सका।
 
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