अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के लिए एशियाई देश बन रहे नए गंतव्य

दुनिया के तमाम विकसित व विकासशील देश इस समय अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को लुभाने में जुटे हुए हैं। इसके लिए हर देश अपने वीजा व वर्क परमिट के नियमों में बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। पिछले कुछ सालों में ही एशियाई देश जिस तेजी से उच्च शिक्षा के नए गंतव्य बनकर उभरे हैं उससे अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में कई नए बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

अभी तक उच्च शिक्षा के लिए अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की पहली पसंद रहे यूरोप, अमेरिका व आस्ट्रेलिया को अब एशिया से चुनौती मिलने लगी है। एक तरह से उच्च शिक्षा के मामले में अमेरिका, यूरोप व आस्ट्रेलिया का एकाधिकार धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है।

अभी तक अमेरिका, यूरोप व आस्ट्रेलिया में पढ़ाई के लिए आवेदन करने वाले अंतर्राष्ट्रीय छात्रों में अधिकांश एशियाई मूल के होते थे। लेकिन एशियाई देशों द्वारा अपनी उच्च शिक्षा की नीति में बदलाव व नई योजना पर काम करने से परिस्थितियां बदल गई है। बड़ी संख्या में अंतर्राष्ट्रीय छात्र अब उच्च शिक्षा के लिए एशियाई देशों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। हालांकि  इसकी एक बड़ी वजह अमेरिका, यूरोप व आस्ट्रेलिया के मुकाबले एशिया में सस्ती पढ़ाई होना भी है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण है टाइम्स हायर एजुकेशन द्वारा वर्ष 2012 के लिए जारी दुनिया की टॉप 200 यूनिवर्सिटी में एशिया की 21 यूनिवर्सिटी का शामिल होना। खासकर जापान, चीन, हांगकांग, कोरिया गणराज्य उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के लिए नई पसंद बनकर उभरे हैं।

टाइम्स हायर एजुकेशन द्वारा हाल ही में जारी एशिया की टॉप 100 यूनिवर्सिटी की सूची में भी जापान, चीन, हांगकांग व कोरिया गणराज्य का दबदबा देखने को मिला है। खास बात यह है कि जापान, चीन, सिंगापुर व हांगकांग की यूनिवर्सिटीज ने तो फ्रांस, जापान व इटली तक की यूनिवर्सिटीज को पीछे छोड़ दिया है।

भारत की स्थिति ठीक नहीं
हालांकि इस मामले में 100 करोड़ से ज्यादा आबादी वाला भारत की स्थिति फिलहाल कुछ ठीक नहीं है। अपनी आंतरिक व राजनीतिक कलह की वजह से भारत को अभी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाने में काफी मेहनत करनी होगी। जबकि सिंगापुर व ताइवान जैसे देशों ने भी उच्च शिक्षा में अपनी पैठ बना ली है।

शिक्षा के बहाने पर्यटन को बढ़ावा
विकसित व विकासशील देशों में अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करने के लिए अचानक पैदा हुए इस रुझान की कई वजह हैं। सबसे बड़ी वजह अंतर्राष्ट्रीय छात्रों के बहाने पर्यटन को बढ़ावा देना हैं। दरअसल अंतर्राष्ट्रीय छात्र न केवल मोटी फीस चुकाते हैं बल्कि उनके रहने, खाने, घूमने व शॉपिंग करने में इन देशों को आर्थिक रूप से फायदा होता है।

पर्यटकों की संख्या में वृद्धि
खासकर पर्यटन का तो मुफ्त में ही प्रचार प्रसार हो जाता है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय छात्र यहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने दोस्तों व रिश्तेदारों से अपने अनुभव साझा करते हैं और उन्हें संबंधित देश में उच्च शिक्षा का सुझाव भी देते हैं। देखा जाए तो जापान, चीन, हांगकांग, उत्तर कोरिया, मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड आदि जैसे देशों ने पर्यटन के क्षेत्र में काफी विकास किया है। हर साल इन देशों में आने वाले पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो रही है।

एशियाई देशों का नया लक्ष्य
पिछले दिनों जापान ने राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों ने 2020 तक अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए जापानी विश्वविद्यालयों ने ज्यादा से ज्यादा पाठ्यक्रम अंग्रेजी माध्यम में रखने का निर्णय लिया। वहीं चीन ने अपने विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालयों में होने वाले अकादमिक भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए हैं।

वीजा नियमों में संशोधन की तैयारी
उधर थाईलैंड ने विदेशी छात्रों को लुभाने के लिए वीजा नियमों में संशोधन की तैयारी शुरू कर दी है। मलेशिया भी 2020 तक अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की संख्या 2 लाख तक पहुंचाने के लिए अपनी नीतियों में बदलाव कर रहा है। इंडोनेशिया भी अपने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित करने की योजना पर काम कर रहा है।

पड़ोसी  देशों को प्राथमिकता
एशियाई देशों की नई रणनीति का असर यह हुआ है कि अब एशियाई देशों के ही छात्र उच्च शिक्षा के लिए अन्य महाद्वीप में जाने के बजाए अपने ही पड़ोसी  देशों को प्राथमिकता देने लगे हैं। आलम यह है कि आस्ट्रेलिया को थाईलैंड, ताइवान, हांगकांग व सिंगापुर में अपने एजुकेशन काउंसलर पोस्ट बंद करना पड़ा है। इसकी वजह इन देशों के छात्रों के आस्ट्रेलियाई यूनिवर्सिटीज में नामांकन में आयी भारी गिरावट है। ब्रिटेन अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को लुभाने के लिए वीजा नियमों में संशोधन कर रहा है। जबकि अमेरिका के वाशिंगटन राज्य द्वारा अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की फीस में वृद्धि के प्रस्ताव का स्थानीय शिक्षाविदों ने विरोध करना शुरू कर दिया है। 
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